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नाविक
Aug 7, 2018
2 minute read


इक नाविक हो तुम
सपनों के जहाज पर बैठे
चांद निहारते हो,
थोङे रिमझिम से ख्याल सोचते
आंखें मूंदते हो।

इस समंदर का अपना क्या है?
पानी भी दूर पहाड़ों का है,
सन्नाटा भी बिछङी शामों का है,
परछाई चांद की खुद की है,
अनन्तता तो जीवन की है।

पर मंझधार तो तुम्हारा है,
खुशियां बीत चुकी, ठीकाना तो तुम्हारा है,
चूड़ियाँ टूट चुकी, एहसास तो तुम्हारा है,
सुबह आया, शाम चला गया, दौरान तो तुम्हारा है,
नाविक तो मैं हूं, पर क्या यह जहाज तुम्हारा है?!

This was written at Lake Tahoe. Himanshu Mishra was with me. We went to the lake during the evening. I wrote this during night.
Tired from a long day of travel, Himanshu fell asleep around three. I sneaked out at dawn, went to the lake. There was no one except for an old-age couple. I managed to click few decent photographs. Highly recommended to wake the next guy up before sneaking out.

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